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छोटू छलिया को मिले कंगन से मचा राजनीतिक बवाल, जांच की मांग पर आमने-सामने आए राजद-जदयू

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लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन समारोह में लोक गायक छोटू छलिया को राबड़ी देवी द्वारा कंगन उपहार में दिए जाने का मामला अब राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है। जदयू ने जांच की मांग की है, जबकि राजद ने आरोपों को बेबुनियाद बताया है।

पटना/आलम की खबर:राजधानी पटना में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में दिया गया सम्मान अब बिहार की राजनीति में चर्चा और विवाद का विषय बन गया है। राष्ट्रीय जनता दल के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन समारोह के दौरान लोक गायक छोटू छलिया को राबड़ी देवी द्वारा कंगन भेंट किए जाने की घटना पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है और मामला अब सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन चुका है।

दरअसल, लालू प्रसाद यादव के 79वें जन्मदिन के अवसर पर पटना स्थित उनके सरकारी आवास पर एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस मौके पर पार्टी नेताओं, कार्यकर्ताओं, समर्थकों और परिवार के सदस्यों की बड़ी मौजूदगी रही। दिनभर शुभकामनाओं का सिलसिला चलता रहा, जबकि शाम होते-होते सांस्कृतिक कार्यक्रम ने पूरे माहौल को उत्सव में बदल दिया।

कार्यक्रम में बिहार की लोक संस्कृति की झलक देखने को मिली। लोकगीत, चैता, सोहर और पारंपरिक प्रस्तुतियों ने उपस्थित लोगों का मन मोह लिया। इसी दौरान भोजपुरी लोक गायक छोटू छलिया ने मंच से ऐसी प्रस्तुति दी जिसने कार्यक्रम में मौजूद नेताओं और मेहमानों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। उनकी प्रस्तुति से प्रभावित होकर राबड़ी देवी ने अपने हाथों में पहने कंगन उतारकर उन्हें उपहार स्वरूप दे दिए।

कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने इस क्षण का स्वागत तालियों से किया। कुछ ही देर में इस पूरे घटनाक्रम के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे। शुरुआत में इसे कलाकार के सम्मान और प्रोत्साहन के रूप में देखा गया, लेकिन बाद में यह घटना राजनीतिक बहस का कारण बन गई।

विवाद तब और बढ़ गया जब लोक गायक छोटू छलिया ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि उन्हें जो कंगन मिले हैं, वे हीरे जड़े हुए हैं। उन्होंने इसे अपने जीवन का सबसे बड़ा सम्मान बताया और कहा कि कलाकारों को इस तरह का सम्मान मिलना उनके लिए गर्व की बात है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में नई चर्चा शुरू हो गई।

जनता दल यूनाइटेड के नेताओं ने पूरे मामले पर सवाल उठाए। पार्टी की ओर से कहा गया कि यदि उपहार में दिए गए कंगन वास्तव में मूल्यवान हैं तो उससे जुड़ी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। कुछ नेताओं ने इस मामले की जांच की मांग भी उठाई और कहा कि पूरे घटनाक्रम की पारदर्शिता सुनिश्चित होनी चाहिए।

जदयू नेताओं का तर्क है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों से जुड़े मामलों में पारदर्शिता आवश्यक होती है। उनका कहना है कि यदि किसी कलाकार को महंगे आभूषण उपहार में दिए गए हैं तो उससे संबंधित तथ्यों को स्पष्ट किया जाना चाहिए ताकि किसी प्रकार का भ्रम न रहे।

दूसरी ओर राष्ट्रीय जनता दल ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित करार दिया है। राजद नेताओं का कहना है कि विपक्ष के पास जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर चर्चा करने के लिए कोई ठोस एजेंडा नहीं बचा है, इसलिए सांस्कृतिक कार्यक्रम की एक सामान्य घटना को विवाद का रूप दिया जा रहा है।

राजद के विधान पार्षद सुनील सिंह ने इस मुद्दे पर खुलकर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि बिना पूरी जानकारी के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है। उनका कहना था कि हर चमकने वाली वस्तु हीरा नहीं होती और हर पीली धातु सोना नहीं होती। उन्होंने दावा किया कि राबड़ी देवी महंगे हीरे के आभूषण पहनने के लिए नहीं जानी जाती हैं और इस मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।

सुनील सिंह ने यह भी कहा कि बिहार में बेरोजगारी, विकास, कानून व्यवस्था और किसानों की समस्याओं जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे मौजूद हैं, लेकिन कुछ राजनीतिक दल इन विषयों पर चर्चा करने के बजाय ऐसे मामलों को लेकर राजनीति कर रहे हैं। उन्होंने इसे जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश बताया।

राजनीतिक बयानबाजी के बीच सोशल मीडिया पर भी लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे कलाकार के सम्मान का प्रतीक बता रहे हैं, जबकि कुछ लोग उपहार की कीमत और उससे जुड़े दावों पर सवाल उठा रहे हैं। इस कारण यह मामला लगातार चर्चा में बना हुआ है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में जैसे-जैसे राजनीतिक गतिविधियां तेज होंगी, वैसे-वैसे ऐसे मुद्दे भी अधिक चर्चा में आएंगे। छोटी घटनाएं भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाती हैं और विभिन्न दल अपने-अपने दृष्टिकोण से उन्हें जनता के सामने रखने का प्रयास करते हैं।

हालांकि अब तक किसी एजेंसी द्वारा मामले में कोई औपचारिक जांच शुरू नहीं की गई है। पूरा विवाद फिलहाल राजनीतिक बयानों और मीडिया चर्चाओं तक सीमित है। फिर भी जिस तेजी से यह मुद्दा सुर्खियों में आया है, उसने बिहार की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

जिस सांस्कृतिक कार्यक्रम का उद्देश्य उत्सव और लोक कलाकारों का सम्मान था, वह अब राजनीतिक आरोपों और जवाबी हमलों का मंच बन गया है। आने वाले दिनों में यह मामला किस दिशा में आगे बढ़ता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

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लोक कलाकारों का सम्मान भारतीय संस्कृति की पहचान रहा है। मंच पर उत्कृष्ट प्रस्तुति देने वाले कलाकारों को सम्मानित करना कोई नई परंपरा नहीं है। लेकिन जब सार्वजनिक जीवन से जुड़े बड़े राजनीतिक चेहरे किसी कार्यक्रम का हिस्सा होते हैं, तो छोटी घटनाएं भी बड़े राजनीतिक विमर्श का रूप ले सकती हैं।

इस मामले में भी तथ्य और राजनीति दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि चर्चा तथ्यों के आधार पर हो और किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पूरी सच्चाई सामने आने दी जाए। लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी है तथ्यों का सम्मान करना।

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